सरोजिनी नायडू का जीवन परिचय | Sarojini Naidu


प्राचीन काल में हालत चाहे जो भी रही हो, पर पिछले सैकड़ों सालों में भारतीय स्त्रियां बहुत ही पिछड़ी अवस्था में रहीं । उनके इस पिछड़ेपन के कारण उनका पुरातनपंथी स्वभाव ही नहीं था, बल्कि यह भी था कि उन्हें आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया जाता था। जब लड़कियों को शिक्षा नहीं दी जाएगी, उन्हें बाहर नहीं निकाला जाएगा, चूल्हा-चक्की तक ही उन्हें सीमित रखा जाएगा, तब सरोजिनी जैसी स्त्रियां कहां देखने को मिलेंगी ?

सौभाग्य से सरोजिनी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां लड़कों और लड़कियों, दोनों के लिए शिक्षा के बराबर मौके थे। उनके पिता श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय यों थे तो बंगाली, पर वास्तव में उनकी कोई खास जाति नहीं थी। उन्हें सभी जातियों से प्रेम था और वह सबकी अच्छाई ग्रहण करना चाहते थे। वह बहुत बड़े विद्वान भी थे। उनके संबंध में स्वयं सरोजिनी ने लिखा है –

"मैं समझती हूं कि सारे भारत में उनसे ज्यादा विद्वान थोड़े ही लोग होंगे। उन्हें जो कोई भी जानता था, प्यार करता था। उनके चेहरे की विशेषता एक लंबी दाढ़ी थी। यूनानी कवि होमर से उनका चेहरा बहुत कुछ मिलता था । वह बड़े मिलनसार और हंस-मुख प्रकृति के थे। उन्होंने अपना सारा धन दो कामों में खर्च किया - एक तो, दूसरों को सहायता देने में, और दूसरा अलकैमी यानी सोना बनाने के रहस्यमय रासायनिक प्रयोग में। उनके घर में एक दरबार-सा लगा रहता था। जिसमें सब धर्मों के विद्वान, राजा, रंक, संत-संसारी, इत्यादि इकट्ठे होते थे ।“

इस वर्णन से ही मालूम होता है कि अघोर बाबू के घर में सब तरह की शिक्षा के लिए द्वार खुले थे। वह हैदराबाद में ही स्थायी तौर पर बस गए थे, और हैदराबाद उस युग में मुस्लिम-शिक्षा तथा संस्कृति का मुख्य गढ़ समझा जाता था | हैदराबाद के निजाम मुसलमान विद्वानों तथा संतों को दूर-दूर से बुलाकर आश्रय देते थे | अरब-तुर्किस्तान तक से लोग यहां आते थे।

इसी कारण सरोजिनी ने लिखा है, “मैंने ऐसे माता पिता के यहां जन्म लिया, जो हिन्दू संस्कृति के उत्कृष्ट प्रतीक थे। सौभाग्य से मेरा लालन-पालन ऐसे वातावरण में हुआ, जिसमें इस्लाम के सर्वोत्तम गुण विद्यमान थे। इन दोनों धर्मों का मुझ पर प्रभाव पड़ा और मेरा जीवन उन्नत हुआ। अतः जब मैं हिंदुओं और मुसलमानों को - जिनकी सामान्यतः एक ही तरह की रीतियां तथा परंपराएं हैं, रस्पर झगड़ते देखती हूं, तो मेरा हृदय टूक-टूक हो जाता है ।“


सरोजिनी नायडू का जन्म


सरोजिनी का जन्म १३ फरवरी, १८७९ को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता तो विद्वान थे ही, माता भी बांग्ला में कविता करती थी। सरोजनी का पालन-पोषण इस प्रकार हुआ कि उन्होंने पूर्वी देशों की संस्कृति को तो समझा-परखा ही, पश्चिमी देशों के साहित्य तथा कला से भी वह परिचित हुई। कविता के प्रति उनका विशेष अनुराग था । वह अंग्रेजी में भी उसी प्रकार आसानी से बोल लेती थी, जिस प्रकार बांग्ला या उर्दू में।


सरोजिनी नायडू की शिक्षा


पढ़ने-लिखने में सरोजिनी बहुत तेज थी। १२ वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने मैट्रिक पास किया और इसके दूसरे वर्ष १३ साल की अवस्था में, छः दिन में ही “लेडी आफ द लेक” यानी "झील की सुंदरी' नाम की १८०० पंक्तियों की एक अंग्रेजी कविता लिख डाली। इस संबंध में सरोजिनी ने लिखा है कि “जब वह बीजगणित के एक सवाल का जवाब सोच रही थीं, तभी उनके दिमाग में एक पूरी कविता आई, जिसे उन्होंने लिख डाला।“

सोलह साल की उम्र में, १८९५ में निजाम सरकार ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। वहां वह कुछ दिनों तक लंदन के किंग्स कालेज में पढ़ीं और उसके बाद केंब्रिज के गिरटन कालेज में| तीन साल वह इंग्लैंड में रहीं और इन तीन सालों में कवि के रूप में उनकी काफी ख्याति फैल गई। पहले-पहले उन्होंने अंग्रेजी के ढंग पर अंग्रेजी कविता की, पर आर्थर आइमन्स और एडमंड गास, आदि मित्रों ने उन्हें सलाह दी कि वह भारतीय द्रष्टिकोण से अंग्रेजी में कविता लिखें। उनका कहना था कि इस प्रकार लिखने से उनकी कविता में एक नयापन आएगा। अब सरोजनी उनकी सलाह के अनुसार कविता लिखने लगी और सचमुच मौलिकता के कारण इन कविताओं की बड़ी कद्र हुई।


सरोजिनी नायडू का विवाह


सन् १८९८ में वह भारत लौटी और एक दक्षिण भारतीय डाक्टर गोविंद राजुलु नायडु से उनकी शादी हो गई। सरोजिनी बंगाल की थीं और वह आंध्र के, सरोजनी ब्राह्मण थीं और वह अब्राह्मण-इस प्रकार, यह शादी सारी रूढ़ियों और रीति-रिवाजों को तोड़कर हुई।


सरोजिनी नायडू की कविताए


सन् १९०५ में “गोल्डन थ्रे शोल्ड” (सुनहरी ड्योढ़ी) नामक उनका पहला कविता संग्रह जब संसार के समक्ष आया, तो विश्व साहित्य-जगत की आंखें एक बारगी चौंधिया गई । तत्पश्चात्, उनकी दो अन्य महान कृतियां “बर्ड आफ टाइम” (काल-पखेरू) तथा “ब्रोकन विंग” (भग्न-पंख) प्रकाशित हुई और सरोजिनी देवी को विश्व की सर्वोत्कृष्ट कवि-परंपरा में स्थान प्राप्त हो गया।

“बर्ड आफ टाइम” पर अपने बहुमुल्य विचार प्रकट करते हुए, अंग्रेजी साहित्य के प्रख्यात समालोचक सर एडमंड गास ने कहा था – “आलोचना की ऐसी कोई कसौटी नहीं, जिस पर यह एकदम खरी न उतरती हो।“


सरोजिनी नायडू का स्वतंत्रता संग्राम


सरोजिनी की कुछ कविताओं का फ्रेंच आदि भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। सचमुच यदि वह केवल कविता ही लिखती रहती, तो इस क्षेत्र में अद्वितीय हो जाती। पर कविता का मधुर जाल उन्हें अपने देश की दशा से विमुख न रख सका । वह आगे चलकर अपने देश के स्वातंत्र्य-संग्राम में कूद पड़ी।

सन् १९१४ -१९१८ थम विश्व युद्ध में भारतीयों ने यह सोचकर अंग्रेजों की मदद की थी कि जब वे जीत जाएंगे, तो भारत को स्वराज्य दे देंगे, पर हुआ उल्टा ही। अंग्रेज अब और दबदबे से राज्य करना चाहते थे, उन्होंने भारतीयों के हक बढ़ाने की बजाय एक ऐसा बिल लाना चाहा, जिससे भारतवासियों के कुछ हक ही नहीं रह जाते। इसके विरोध में महात्मा गांधी ने आंदोलन चलाया | सरोजिनी का कवि हृदय अपने देशवासियों की इस दुर्दशा पर रो पड़़ा। पर अभी वह चुप रहीं - उपयुक्त समय आने में अब भी कुछ देर थी।

इसी बीच उनका स्वास्थ्य बहुत गिर गया और वह स्वास्थ्य सुधारने के लिए फिर इंग्लैंड चली गई। वहां से लौटने पर उन्होंने देखा कि देश की परिस्थिति और बिगड़ चुकी है। अतः उन्होंने कवि का जीवन छोड़ दिया और देशवासियों की सेवा में गांधीजी के साथ हो गई। इसके बाद तो वह जीवन भर गांधीजी के पीछे-पीछे चली। न उन्होंने सुख की परवाह, न गृहस्थी की। कई बार वह जेल गई। जब जेल से बाहर रहती, तो बराबर देश भर में दौरे करतीं और लोगों को स्वतंत्रता के सिद्धांत समझाती।


सरोजिनी नायडू को भारत कोकिला कहा जाना


उनके व्याख्यानों को सुनने के लिए हजारों की तादाद में भीड़ हुआ करती थी। वह बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी और गुजराती में, जहां जैसी जरूरत पड़ती-बोलती। उनकी वाणी में कविता का बड़ा जबर्दस्त पुट होता था | इन्हीं व्याख्यानों के कारण उन्हें “भारत कोकिला” की उपाधि मिली थी।

बहुत से लोग यह समझते हैं कि उनकी कविताओं के कारण ही उनको "भारत कोकिला' कहते हैं, पर बात ऐसी नहीं है। उनके छोटे भाई हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का, जो स्वयं एक कवि तथा नाटककार हैं, कहना है कि अपने काव्यपूर्ण जोशीले व्याख्यानों के कारण ही वह “भारत कोकिला” कहलाई।

कुछ लोगों का कहना है कि जहां तक अंग्रेजी भाषा में व्याख्यान देने का सवाल है, सारे कांग्रेस में उनसे बढ़कर कोई नहीं था। कांग्रेस के बाहर भी दो-एक वक्ता ही उनके मुकाबले के थे। एक बार १९२० के जमाने में, वह लंदन की एक सभा में बोल रही थी। जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर जो गोलियां चलाई गई थी, उसी के संबंध में यह सभा थी। कुछ अंग्रेज तो मन लगाकर उनका भाषण सुनने आए थे, पर कुछ इस इरादे से आए थे कि हुल्लड़ मचाकर सभा में गड़बड़ी पैदा कर दें। पर एक बार जब सरोजिनी बोलने लगी, तो हुल्लड़ के इरादे से आए हुए अंग्रेज भी शांत हो गए। फिर भी उनमें से एक-दो तो ऐसे थे ही, जो प्रभावित न हुए। उनको हर सुरत में हुल्लड़ करना ही था। अंतः वे बीच में चिल्ला उठे, पर जनता ने उनका साथ नहीं दिया। दूसरी ओर, जब सरोजिनी ने यह देखा, तो उनकी आंखें लाल हो गई और हल्लड़बाजों की तरफ देखकर वह चिल्ला पड़ी – “शट अप” यानी चुप रहो। इसका इतना जबद्दस्त प्रभाव पड़ा कि फिर किसी को गड़बड़ करने की हिम्मत न हुई। इससे स्पष्ट है कि जब अंग्रेजों अथवा विदेशियों पर उनका इतना प्रभाव पड़ता था, तब भारतीय जनता पर कितना प्रभाव पड़ता होगा।

अपनी सेवाओं और त्याग के कारण श्रीमती नायडु शीघ्र ही सर्वसाधारण में लोकप्रिय बन गई। १९२५ में जब कानपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तो वह उसकी अध्यक्षा चुनी गई। कांग्रेस के सभी लोग, चाहे गरम दल के हों, या नरम दल के, उनका सम्मान करते थे। वह स्त्रियों की अनेक संस्थाओं और सम्मेलनों की कर्णधार रही। वह चाहती थी कि स्त्रियां किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे न रहें।


सरोजिनी नायडू का पारिवारिक जीवन


सरोजिनी ने केवल कवि, वक्ता और नेत्री के रूप में ही नाम नहीं कमाया, मां और गृहिणी के रूप में भी वह किसी से पीछे नहीं थी। जैसा कि उनकी भाभी कमला देवी चट्टोपाध्याय ने लिखा है, - “वह बच्चों के लालन-पालन और लाड़-प्यार में भी काफी आगे थी। इतनी बड़ी नेत्री होने के बाद भी वह अक्सर अपने हाथ से भोजन पकाती थी।“

उनके भाई हरीन्द्रनाथ ने भी लिखा है कि – “वह बहुत सुंदर “स्टू और सूप” बनाती थी। सरोजिनी के चार बच्चे पैदा हुए, जिनमें से रणधीर नाम का लड़का, जिसे वह सबसे अधिक चाहती थी, बचपन में ही मर गया। अपने इस लड़के को वह जीवन के अंतिम दिन तक नहीं भूल सकी। साधारणतः लोग समझते थे कि सरोजिनी एक पत्थर की देवी है, पर वस्तुतः वह बहुत प्रेममयी और दयालु मां, बहन तथा पत्नी थी।

सरोजिनी नायडू ने १९३१ में कांग्रेस की प्रतिनिधि के रूप में लंदन की “गोलमेज कांफ्रेंस” में भी भाग लिया था और १९३२ में भारत सरकार की प्रतिनिधि बनकर दक्षिण अफ्रीका गई थी | वहा उन्होंने भारतीयों की दशा का गहरा अध्ययन किया प्रवासी भारतीयों की समस्याओं में उनकी दिलचस्पी बराबर बनी रही।


सरोजिनी नायडू का राज्यपाल बनाना


सरोजिनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह सच्चे अर्थों में स्वयंसेविका थी। जब-जब देश में आंदोलन हुआ, तब-तब वह आगे आई और जेल गई। अंतिम बार वह १९४२ के “भारत छोड़ो” आंदोलन में जेल गई, और तीन साल बाद मुक्त हुई। अगस्त १९४७ में भारत के स्वतंत्र होने पर उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया।


सरोजिनी नायडू की मृत्यु


उत्तर प्रदेश का राज्यपाल पद पर वह दो साल भी नहीं रह सकी और १२ मार्च १९४९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनके निधन के साथ ही भारत ने अपनी एक ऐसी सुपुत्री खो दी, जिसकी सेवाओं की उसे अत्यधिक जरूरत थी।

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