जवाहरलाल नेहरू का जीवन परिचय | Jawaharlal Nehru


जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए भारत के लोगों ने जो आंदोलन चलाया था, उसमें नेहरू ने तन-मन-धन न्यौछावर कर दिया था। गांधीजी के वह दाहिने हाथ थे। प्रधानमंत्री होकर उन्होंने देश में कल-कारखाने, ज्ञान-विज्ञान की तरक्की शुरू की ताकि देश की गरीबी दूर हो। भारत में लोकतंत्र यानी जनता के द्वारा चुनी हुई संसद और विधान सभाओं द्वारा शासन स्थापित करने में उनका बड़ा हाथ था। जैसे वह देश भक्त थे, वैसे वह विद्वान थे। वह अपने देश के लोंगों को बहुत प्यार करते थे। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था – “मुझे देश के लोगों ने असीम प्यार दिया है और मैं नहीं जानता कि इसके बदले में मैं उन्हें क्या दूं।“ और जवाहरलाल ने अपना सब कुछ देश को दे दिया।


जवाहरलाल नेहरू का जन्म


जवाहरलाल का जन्म इलाहाबाद में १४ नवंबर १८८९ को हुआ था। इनके पिता मोतीलाल नेहरू और माता स्वरूपरानी नेहरू ने इनमें प्यार के साथ अच्छी आदतें डालीं। मोतीलाल देश के बड़े नामी वकील थे। इनके पूर्वज श्री राजकौल अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में कश्मीर से दिल्ली आ गए थे। उस समय के बादशाह फर्रुखसियर ने उन्हें नहर के किनारे मकान दिया था। नहर के किनारे रहने के कारण वह नेहरू कहलाए। १८५७ की लड़ाई के बाद, परिवार आगरे में जा बसा और जब वहां से हटाकर हाईकोर्ट इलाहाबाद में स्थापित किया गया तो जवाहरलाल के चाचा जो वकील थे, इलाहाबाद में बस गए।


जवाहरलाल नेहरू की शिक्षा


पंद्रह वर्ष की आयु तक जवाहरलाल की शिक्षा घर पर अंग्रेज और आयरिश मास्टरों की देखरेख में हुई। बचपन से ही जवाहरलाल का यह स्वभाव था कि गलत बात या अन्याय को वह सहन नहीं कर सकते थे। ग्यारह वर्ष की आयु में उनके एक बहन हुई, तो वह खुशी से नाच उठे। इस पर वहां मौजूद डाक्टर ने मजाक में उनसे कहा – “तुम्हें तो खुश होना ही चाहिए। भाई होता तो जायदाद में हिस्सा बंटाता” इस पर बालक जवाहर क्रुद्ध होकर बोला – “डाक्टर साहब, मै इतना ओछा नहीं हूँ।“ मोतीलाल नियम कायदे के पाबंद थे और गलती करने पर जवाहर से सख्ती से पेश आते थे।

एक दिन जवाहर ने पिता की मेज पर दो सुंदर फाउंटेन पेन देखे और यह सोचकर कि पिताजी एक साथ दो लमों से तो लिखेंगे नहीं, उसने एक उठा लिया। जब कलम की खोज शुरू हुई तो डर से चुप लगा गए। अंत में पकड़े गए और पिताजी ने इतना मारा कि कई दिनों तक दर्द रहा। फिर भी बालक के मन में पिता के लिए अगाध स्नेह और आदर था।

बालक जवाहर के बदन में बड़ी फुर्ती थी। उनकी कूदफांद से तंग आकर मोतीलाल उन्हें बंदर कहा करते थे। यह फुर्ती उनमें वृद्धावस्था में भी बनी रही। सोलह वर्ष की आयु में जवाहरलाल पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजे गए। उन्होंने हैरो के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल में और बाद में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई और लंदन से बैरिस्टरी पास करके, सात वर्ष बाद वह १९१२ में स्वदेश लौटे।


जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक जीवन


उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत शुरू की और १९१२ के कांग्रेस अधिवेशन में वह प्रतिनिधि की हैसियत से शामिल हुए। १९१६ में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में पहली बार वह गांधीजी से मिले। लेकिन उस समय तक उनको पूरा विश्वास नही था कि बिना युद्ध किए अंग्रेजों को देश से निकाला जा सकता है, इसलिए गांधीजी के असहयोग आंदोलन पर, उनका मन न जमा क्योंकि यह अहिंसापूर्वक बिना हथियार और सेना के अंग्रेजी सरकार का विरोध और उससे असहयोग करने का कार्यक्रम था।


जवाहरलाल नेहरू का विवाह


सन् १९१६ की बसंत पंचमी को उनका विवाह दिल्ली में कमला कौल से हुआ। दूसरे वर्ष १९ नवंबर को उनके घर एक बालिका ने जन्म लिया। उसका नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी रखा गया, जो आगे चलकर देश की प्रधानमंत्री बनी।


जवाहरलाल नेहरू के कार्य


सन् १९१९ में अमृतसर में जलियांवाला बाग के हत्याकांड ने भारतवासियों को हिला दिया। इसमें निहत्थी जनता पर अंग्रेजी फौजी अफसर डायर ने अंधाधुध गोलियां बरसाई। इसी घटना के बाद गांधीजी ने अंग्रेजी सरकार से असहयोग करने का निश्चय किया। आंदोलन जोरों से चला। हजारों आदमी जेल गए। जवाहरलाल भी पहली बार जेल में बंद हुए। आजादी की लड़ाई के दौरान वह कई बार गिरफ्तार हुए और उनके जीवन के कई वर्ष जेल में ही बीते। जेल में बड़ी तकलीफ दी जाती थी।

१९३३-३४ में वह देहरादून जेल की एक छोटी सी कोठरी में चौदह महीने से अधिक बंद रहे। अपनी आत्मकथा में नेहरू जी ने लिखा है कि अक्सर बिस्तर या किताब पर उन्हें बिच्छू मिलते। मगर आश्चर्य है कि उन्होंने मुझे कभी डंक नहीं मारा। तीन चार सांप भी उनकी कोठरी में और उसके आस पास मारे गए।

सन् १९२७ में जवाहरलाल कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में यूरोप के बुसेल्स नामक नगर में पराधीन देशों के सम्मेलन में शरीक हुए। वहां उन्होंने देखा कि भारत की तरह दुसरे देशों के लोग भी यूरोप के देशों की गुलामी से लड़ रहे हैं। वह रूस भी गए। वहां की जनता ने अत्याचारी जार और उसके बड़े-बड़े जागीरदारों को मार भगाया था। लेकिन नेतृत्व में वहां साम्यवादी शासन कायम हुआ था | वहां से नए विचार लेकर वह भारत लौटे और दिसंबर १९२७ के मद्रास कांग्रेस में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया कि भारत का लक्ष्य पूर्ण आजादी हासिल करना है। तब गांधीजी और कांग्रेस इस पर राजी थी कि अगर भारत के लोगों को अपना शासन खुद करने दिया जाए तो वे अंग्रेज के बादशाह को अपना बादशाह मानते रहेगे। इस अधिवेशन ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निश्चय किया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने यह जांच करने के लिए भेजा था कि भारतीय लोग स्वशासन के योग्य है या नही और उन्हें क्या अधिकार दिए जाए। साइमन कमीशन के खिलाफ लखनऊ में हुए प्रदर्शन में जवाहरलाल ने दो दिन भाग लिया। पहले दिन एक घुड़सवार ने उनकी पीठ पर दो बार लाठी से वार किया। अपनी आत्मकथा में नेहरूजी लिखते हैं कि शरीर की पीड़ा भूलकर इस बात से मैं बड़ा खुश था कि लाठियां सहकर भी खड़ा रहा। लेकिन दूसरे दिन उन पर इस कदर लाठियां बरसी कि एक बार उनमे प्रतिशोध की भावना जाग उठी, पर उन्होंने अपने का सम्हाल लिया क्योंकि गांधीजी का आदेश था कि सरकार कितना भी अत्याचार करे, तुम बदले में हाथ न उठाओ।

जवाहरलाल की बहादुरी और निर्भीकता की कई घटनाएं हैं। मध्यप्रदेश का दौरा करते समय उनकी कार को डाकुओं के एक गिरोह ने घेर लिया। पंडितजी उतर पड़े और डपट कर बोले, "मैं जवाहरलाल हूँ। आप लोग क्या चाहते हैं?" डाकुओं के सरदार ने नोटों का एक बंडल पंडितजी की ओर बढ़ाते हुए कहा, "मैं आपको ये रुपये भेंट करना चाहता हूँ।" पंडितजी ने नोटों का बंडल ले लिया और कार में जा बैठे। रास्ते में उनके एक साथी ने कहा, "यह लोग डाकू थे।" विनोदी प्रकृति के जवाहरलाल ने सहज भाव में कहा, "मैं उनसे कौन सा कम हूं। देखा नहीं, किस तरह पैसे छीन लाया।"

दिसंबर १९२८ में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में यह निश्चय किया गया कि यदि अंग्रेज़ साल भर के अंदर भारत को आजादी देने को राजी नहीं हुए तो, कांग्रेस फिर पूर्ण आजादी लिए बिना न मानेगी। एक साल बीत गया और काग्रेस के अगले अधिवेशन का समय आ गया। अध्यक्ष के लिए कई नाम आए, पर गांधीजी के कहने पर जवाहरलाल अध्यक्ष चुने गए। उस समय गांधीजी ने कहा था – “बहादुरी और देशभक्ति में उनका मुकाबला नहीं, और उनका दिल दर्पण की तरह साफ है।“ जवाहरलाल के नेतृत्व में ३१ दिसंबर की अर्धरात्रि को लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इस अधिवेशन के बाद युवा वर्ग नेहरू को पूजने लगा।

६ अप्रैल १९३० को गांधी ने नमक कानून तोड़कर सत्याग्रह आरंभ किया। जवाहरलाल जी गिरफ्तार हुए और लंबी अवधि तक जेल में रहे। जेल से समय-समय पर उन्होंने अपनी बेटी इँदिरा को पत्र लिखे, जिसने उन्होंने दुनिया के इतिहास के बारे मे बताया। बाद में ये पत्र “विश्व इतिहास की झांकी” शीर्षक से पुस्तक के रूप में निकले। जून १९३४ और फरवरी १९३५ के बीच उन्होंने अपनी आत्मकथा लिख डाली। इसका बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसी बीच जवाहरलाल की पत्नी कमला बहुत बीमार हो गई। उसका जर्मनी में इलाज हो रहा था, उनकी अंतिम घड़ी जानकर, सरकार ने जवाहरलाल को रिहा कर दिया। जवाहरलाल जर्मनी गए, पर वह कमला को बचा न सकें।

सितबर १९३९ में दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया। ब्रिटिश सरकार भारत को आजादी देने को राजी न थी। महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया। ८ अगस्त १९४२ को बंबई में हुए कांग्रेस अधिवेशन मे प्रस्ताव पास किया कि अंग्रेज़ भारत को छोड़कर चले जाएं। दूसरे ही दिन गांधीजी और दूसरे सभी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और राजेंद्र प्रसाद के साथ जवाहरलाल को अहमदनगर के किले में रखा गया। उन्ही दिनों जेल में जवाहरलाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” लिखी, जिसमें भारत के इतिहास पर विचार किया गया है।

यूरोप में शांति हो जाने पर १९४५ की गर्मियों में जवाहरलाल और दूसरे नेता छोड़ दिए गए। ब्रिटेन में आम चुनावो के बाद नई सरकार स्थापित हुई और उसने भारतीय नेताओं से बातचीत करने के लिए अपने मंत्री भेजे। इस बातचीत के फलस्वरूप जवाहरलाल वाइसराय की कार्यकारिणी के उपाध्यक्ष नियुक्त किए गए। सविधान सभा गठित की गई और उसकी बैठक में जवाहरलाल ने सामाजिक तथा आर्थिक लक्ष्यों की रूपरेखा पेश की। मुस्लिम लीग ने इस सभा का बहिष्कार किया और उसके असहयोग के कारण माउंटबेटन की ३ जून १९४७ की योजना के अंतर्गत देश के विभाजन का निर्णय हुआ।

गांधीजी और जवाहरलाल ने शुरू में विभाजन का विरोध किया। पर बाद में जवाहरलाल ने सोचा कि देश में हमेशा ही फुट बने रहने से तो विभाजन ही अच्छा है। १५ अगस्त १९४७ को जवाहरलाल स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। देश मे अपूर्व उत्साह की लहर दौड़ गई, पर शीघ्र ही विभाजन से उत्पन्न सांप्रदायिक दंगों ने भीषण रूप धारण कर लिया।

जवाहरलाल ने रात दिन एक करके नर-संहार से उत्पन्न स्थिति का मुकाबला किया और भारत आने वाले लाखों शरणार्थियों को फिर से बसाने में अथक परिश्रम किया। ३० जनवरी १९४८ को बापू के प्राणों की आहुति से देश में सांप्रदायिक उत्पात शांत हुआ। गांधीजी की मृत्यु से जवाहरलाल को जितनी वेदना हुई उतनी उन्हें माता-पिता अथवा पत्नी के न रहने से भी नहीं हुई थी।

१९५२ में पहले आम चुनाव हुए, जिनमें १६ करोड़ १० लाख व्यक्तियों ने शांतिपूर्ण मतदान किया और संसार के सबसे बड़े प्रजातंत्र के रूप में देश को ख्याति मिली। कांग्रेस पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ।

यह जवाहरलाल की दूरदर्शिता का सबूत था कि उन्होंने आजादी मिलने से बहुत पहले ही योजनाबद्ध विकास की आवश्यकता को समझा था और १९३८ में ही कांग्रेस से एक योजना समिति बनवाई थी जिसके वह अध्यक्ष थे।

जवाहरलाल नेहरू जानते थे की वैज्ञानिक अनुसंधान ही वह साधन थी, जिसका लक्ष्य भारत के प्रत्येक नागरिक को सुखी और संपन्न बनाना था। उन्हीं के प्रयत्नों से राष्ट्र को वह शक्ति प्राप्त हुई कि वह १९६५ में पाकिस्तान से युद्ध में लोहा ले सका।

जवाहरलाल का विश्वास था कि बिना समाजवाद के देश की सारी जनता को सुख के साधन प्राप्त नहीं होंगे। उन्हीं की प्रेरणा से १९३१ में कांग्रेस ने कराची अधिवेशन में बुनियादी और आर्थिक नीति संबंधी प्रस्ताव स्वीकार किया जिसमें कहा गया था कि बड़े उद्योग, खनिज पदार्थ, रेलें, जहाजरानी निजी अधिकार में न रहकर राज्य की संपत्ति होंगे और सरकार ही उन्हें चलाएगी। आगे चलकर मद्रास के निकट आवड़ी अधिवेशन में जवाहरलाल ने अपने विचारों को और ठोस रूप दिया और कांग्रेस ने घोषणा की कि उसका उद्देश्य समाजवादी समाज की स्थापना करना है। कई प्रांतों में जमीदारी उन्मूलन कानून बने और भूमि को जोतने वाले की ही संपत्ति माना गया।

प्रधानमंत्री के अलावा, जवाहरलाल १७ वर्ष तक भारत के विदेशमंत्री भी रहे। वह सत्य, अहिंसा और महात्मा गांधी के अन्य सिद्धांतों को विदेश नीति में लागू करना चाहते थे। उन्होंने हथियारों पर धन और शक्ति बरबाद करने का विरोध किया। सैनिक गुटों और एक देश द्वारा दुसरे देशों में सैनिक अडडे बनाने के खिलाफ उन्होंने आवाज बुलंद की।

उस समय दुनिया के देशों के दो गुट थे - एक का नेतृत्व अमरीका और दूसरे का सोवियत रूस करता था। दोनों में युद्ध होने का भी भय था। वे एक दुसरे के विरुद्ध प्रचार में लगे रहते थे, जिसे शीतयुद्ध कहा जाता था। जवाहरलाल ने स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी गुट में शामिल नही होगा।

उन्होंने अमरीका और रूस दोनों में दोस्ती रखी। संसार के शांतिप्रिय और नए स्वतंत्र होने वाले देशों को गुठों से अलग रहने की नीति का सुझाव पेश कर, जवाहरलाल ने अंतर्राष्ट्रीय नेता के रूप में ख्याति प्राप्त की और अपना नाम अमर कर गए।


जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु


जनवरी १९६३ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में शामिल होने के लिए जवाहरलाल भुवनेश्वर गए। वहां उन्हें लकवे का हल्का दौरा पड़ा। लेकिन वह अच्छे हो गए और पहले की तरह कठिन परिश्रम करते रहे। २७ मई १९६४ को जब वह सबेरे सोकर उठे तो उन्हें कुछ बैचेनी और कमजोरी महसूस हुई। उसी दिन दोपहर बाद दो बजे वह इस संसार को छोड़कर चले गए। सारे देश में शोक छा गया। लोगों को ऐसा लगा जैसे उनका कोई निकट संबंधी गुजर गया है। २८ मई को राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह-संस्कार किया गया। उनकी मृत्यु से देश के इतिहास का एक युग समाप्त हो गया।

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