लाला हरदयाल | Lala Har Dayal



लाला हरदयाल का जन्म


लाला हरदयाल (Lala Har Dayal) का जन्म १४ अक्तूबर १८८४ को दिल्ली में हुआ था। बालक हरदयाल पर उसकी मां भोलीरानी का बहुत प्रभाव पड़ा। उनकी मां उन्हें विभिन्न संतों और वीरों की कहानियां सुनाती रहती थीं, जिनका उनके ऊपर अमिट प्रभाव पड़ा। उनका परिवार पारंपरिक हिंदू संस्कृति का ही एक रूप था। घर पर राम, कृष्ण की पूजा होती थी।

उनके पिता गौरी दयाल माथुर दिल्ली की जिला कोर्ट में रीडर थे। वह बहुत धनी आदमी तो न थे लेकिन वह फारसी और उर्दू के पंडित हो गए। लाला हरदयाल बचपन में ही बहुत होनहार थे। उनकी स्मरण शक्ति बहुत ही तीव्र थी। उनका एक रिश्तेदार नवीं कक्षा में पढ़ता था, जबकि स्वयं वह पांचवीं कक्षा में थे। एक दिन वह अपना पाठ याद कर रहे थे | जिज्ञासु हरदयाल से न रहा गया। वह बोले, "तुम क्या कर रहे हो? तुम एक ही चीज को बारबार क्यों दोहरा रहे हो?" शिवनारायण ने तिरस्कार से कहा, "तुम अभी बच्चे हो| जब तुम बड़े होंगे तभी यह समझ सकोगे।" इस पर बालक ने कहा, "अरे इसमें क्या है? जो कुछ तुम कह रहे थे वह मैं बता सकता हूँ।" हरदयाल ने शब्दशः पूरा पाठ सुना दिया।

जब हरदयाल छठी कक्षा में थे तभी से उन्होंने “ट्रिब्यून” और “हरविंजर” के संपादकीय लेख पढ़ने शुरू कर दिए थे।

हरदयाल अपने पहनावे पर विशेष ध्यान नहीं देते थे। कभी-कभी वह पायजामा या ढीली-ढाला पतलून पहनकर कालेज चले जाते थे। यहां तक कि उल्टा पायजामा भी पहन जाते थे, उन्हें अपने किताबों के बारे में भी ज्यादा चिंता नहीं थी, इसका कारण यह था कि उन्हें पूरी किताब शब्दशः याद रहती थी।


लाला हरदयाल की शिक्षा


लाला हरदयाल की प्रसिद्धि लाहौर से शुरू हुई। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री ली और सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। दूसरे साल उन्होंने इतिहास में एम. ए. किया और विश्वविद्यालय में सबसे अधिक अंक पाने का रिकार्ड स्थापित किया।

उनके सहपाठी उनसे कहते, “कल हम आपसे शेक्सपियर के नाटक “ओथेलो” से कुछ सुनेंगे।“ दूसरे दिन हरदयाल की स्मरण शक्ति का इम्तहान लेने के लिए उनके सहपाठी कहते कि ओथेलो के दूसरे एक्ट के दुसरे सीन की अंतिम लाइन पढ़िए और उल्टा पढ़िए। हरदयाल यह कर दिखाते।

उन्नीस-बीस वर्ष की आयु तक हरदयाल को पूरे उत्तर भारत में “पंजाब विश्वविद्यालय का देदीप्यमान सितारा” कहा जाने लगा। कालेज के शिक्षक भी हरदयाल से बहुत खुश थे। इसलिए उन्होंने कोशिश करके सरकार से छात्रवृत्ति दिलवा दी, ताकि वह तीन वर्ष के लिए इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने जा सकें।

इंग्लैंड में मिली शिक्षा से हरदयाल में देशप्रेम अंकुरित हुआ। उन्होंने देखा कि अंग्रेज विद्यार्थी राजनीति में बहुत दिलचस्पी लेते हैं। देश के हित को अपना हित मानते हैं जबकि भारतीय विद्यार्थियों के लिए देशप्रेम का अर्थ विद्रोह है।

हरदयाल ने प्रजातंत्र का इतिहास और दूसरे देशों की आजादी की लड़ाई का इतिहास पढ़ा। इसका भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। साथ ही आर्यसमाज के राष्ट्रवादी विचारों ने भी हरदयाल को प्रेरित किया। लाला हरदयाल जैसे आदमी के लिए आई.सी.एस. की परीक्षा में सफल होना कुछ कठिन बात नहीं थी। उन दिनों हर एक शिक्षित भारतीय का यही स्वप्न होता था लेकिन हरदयाल जानते थे कि यह उनके सिद्धांतों के विरुद्ध है।


लाला हरदयाल का विवाह


हरदयाल का विवाह लंदन जाने से पूर्व ही हो गया था, लेकिन उनकी पत्नी भारत में थी। उस समय विदेश यात्रा का तो बहुत विरोध था। अतः हरदयाल छुट्टियों में भारत आए और वह पत्नी को पुरुष के वेश में बंबई ले गए। वहां से वे इंग्लैंड चले गए। उस समय के रुढ़िवादी समाज में ऐसा करना बड़े साहस का काम था।


लाला हरदयाल के कार्य


लंदन में हरदयाल का क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ। भाई परमानंद और सावरकर ने एक गुप्त क्रांतिकारी समाज “अभिनव भारत” की स्थापना की थी। हरदयाल उसके सदस्य थे। राष्ट्रवाद की चिनगारी उनमें सुलगने लगी थी। अपने पत्रो तक में वह सन् की जगह भारतीय विक्रम सम्वत लिखते थे। इसके अलावा उन्होंने लंदन में अपनी पढ़ाई बंद करने का निर्णय भी कर डाला, क्योंकि वह मानते थे कि अंग्रेजी शिक्षा भारतीयो को गुलाम बनाती है और अंग्रेज सरकार से छात्रवृत्ति लेना पाप है। उन्होंने अँग्रेजी कपड़े पहनना और अंग्रेजी खाना भी बंद कर दिया।

इधर भारत में “बंग भंग” के बाद जनता में सरकार के खिलाफ बहुत असंतोष था। गरम दल सरकार की नाक में दम कर रहा था। नरम दल से संबंध टूट जाने पर तिलक ने भारतीय राजनीति में विशिष्ट स्थान बना लिया था। ऐसे समय लाला हरदयाल ने भारत आकर यहां की जनता राष्ट्रवाद की भावना जागृत करना अपना कर्तव्य समझा।

भारत आने पर जब वह अपनी पत्नी से मिले, जो उनसे पहले ही स्वदेश लौट आई थी, उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि उन्हें परिवार का कोई मोह नहीं है। अपनी पत्नी से यह उनकी अंतिम भेंट थी। इसके बाद वह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

लाला लाजपत राय ने उन्हें लाहौर में भारतीय युवकों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रशिक्षित करने का काम दिया। साथ ही वह “पंजाबी” दैनिक के संपादक भी बने। कुछ समय बाद उनका नाम पंजाब के क्रांतिकारियों में गिना जाने लगा।

उनके लिए उर्दू और अंग्रेजी दोनों विदेशी भाषाएं थीं। दक्षिण भारतीयों को संस्कृत में और दूसरों को वह हिंदी में पत्र लिखते थे। सिर्फ प्रचार के उद्देश्य से वह उर्दू और अंग्रेजी में लेख लिखते थे। ये लेख पत्रों में प्रकाशित होते और बहुत ही प्रभावशाली होते थे।

संयुक्त प्रांत और पंजाब के शिक्षित वर्ग में हरदयाल का प्रभाव बढ़ता गया। क्रांतिकारी विचारों की बढ़ती लोकप्रियता से सरकार आतंकित हो उठी और शीघ्र ही उन्हें गिरफ्तार करना चाहती थी। इसलिए हरदयाल ने थोड़े समय के लिए विदेश जाना ठीक समझा।

कई देशों से होते हुए वह पेरिस पहुचे। वहां पर उन्होंने सितंबर १९०९ में “वदे मातरम्” के संपादन का कार्य संभाला। पेरिस सभी देशों के क्रांतिकारियों का केंद्र रहा है। जल्दी ही उन्होंने फ्रेंच भाषा पर पांडित्य प्राप्त कर लिया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने उनका वहां रहना भी मुश्किल कर दिया। अतः विभिन्न देशों में होते हुए वह अमरीका पहुंचे।


लाला हरदयाल और गदर पार्टी


अमरीका में हरदयाल ने भारत में क्रांति के लिए कर्य किया। उन्होंने एक पार्टी का संगठन किया जिसको “गदर पार्टी” कहते थे। अमरीका में रहने वाले भारतीय इसके सदस्य थे। उन दिनों अमरीका में भारतीय अधिकतर मजदूरी करते थे। भारतीय मजदूर सस्ता था इसलिए उसका शोषण होता था। इससे भारतीय मजदूरों में बहुत असंतोष था। हरदयाल ने समझ लिया कि ये मजदूर क्रांतिकारी बनकर भारत को आजादी दिला सकते हैं। अमरीका में भारतीय विद्यार्थी भी थे जिनमें देशभक्ति की कमी नहीं थी, लेकिन अभी तक उनका कोई नेता नहीं था। लाला हरदयाल ने उनका नेतृत्व किया।

दिल्ली में २३ दिसंबर १९१२ को वाइसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। इस घटना के महत्व को बताने के लिए लाला हरदयाल ने एक पुस्तिका तैयार की। इसको फ्रांस में तो बांटा ही गया, साथ ही भारत भी भेजा गया। इस घटना से भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन ने एक नया मोड़ लिया। इस पुस्तिका में बहुत ओजस्वी भाषा में लिखा था – क्रांति के साथियों! तैयार हो जाओ। देश और विदेश में अपने प्रचार को संगठित करो, सेवा और बलिदान के नए व्रत लो। देखो बम ने अपना संदेश सुना दिया है। हिंदुस्तान के नौजवान स्त्री-पुरुष को इसका उतर देना चाहिए।“

सरकार ने लाला हरदयाल को गिरफ्तार करने की ठान ली, अब लाला जी जहां जाते, जासूस उनके पीछे होते। पर उन्हें इसकी परवाह नहीं थी। अध्यापन कार्य उन्होंने पहले ही छोड़ दिया था। वह भारतीयों व अमरीकियों में जोर-शोर से काम करने लगे।

लाला हरदयाल जो गदर आंदोलन आरंभ करने से पहले अखबार निकालना चाहते थे पर इसक लिए धन चाहिए था। भारत से कनाडा आने वालों पर लगे कडे प्रतिबंधों ने आंदोलन के लिए चिनगारी का काम किया। भारतीयों में बहुत असंतोष फैला, जिससे क्रांतिकारी विचारों के प्रचार में सफलता मिली। भारतीयो के विरोध की लहर कनाडा से अमरीका में फैली। संयुक्त राज्य में ऐसा कानून बनाया जा रहा था। जिसके अनुसार दाढ़ी और पगड़ी वाले आदमी अमरीका में नहीं रह सकते थे। इसका मतलब था कि सिख अमरीका से निकल जाएं।

सन् १९१३ तक लालाजी ने थोड़ा धन इकट्ठा कर लिया था। इसके बाद अगस्त १९१४ तक अमरीका के केलीफोर्निया राज्य में जगह-जगह कई गुप्त बैठकें और सभाएं हुई और नवंबर १९१४ को “गदर” नाम का पत्र शुरू किया गया। इसका फल अच्छा हुआ। अमरीका के सैनफ्रांसिस्को राज्य में कई हजार सिख थे, जिनमें अमरीका में प्रस्तावित कानून के विरुद्ध बड़ी उत्तेजना थी लालाजी ने एक दिन सबको बुलाया और कहा आप पैसे की फिजूलखर्ची खत्म कर दें, तभी मैं आपका साथ दे सकता हूँ। तभी से वहां के सभी सिखों ने शराब पीना बंद कर दिया।

अब गदर पार्टी ऐसे नवयुवक तैयार कर रही थी जो भारत लौटकर लोगों को विशेषकर सैनिकों को उकसाएं ताकि वे विदेशी सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएं। इस काम के लिए भारत में कई गुप्त शाखाएं और केंद्र बनाए गए। इनके द्वारा राष्ट्रभक्ति की भावना गांव-गांव में व्याप्त होने लगी। एक वर्ष में ही लालाजी के आंदोलन ने अमरीका में भारतीयों को जागृत कर दिया और वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भड़क उठे। अगस्त १९१४ में महायुद्ध छिड़ गया और सभी भारतीय क्रांति के लिए स्वदेश चल पड़े। भारत की ओर आने वाले हर जहाज में भारतीय बड़ी संख्या में होते। कलकत्ता में ऐसे १५ हजार लोग आ चुके थे। जिन जहाजों में वह आए उनमें सरकारी जासूस भी थे, इसलिए सरकार को सारी योजना का पता चल गया।

इनमें से थोड़े ही लोग अपने घर पहुंच सके, शेष सबको भारत भूमि पर पैर रखते ही गिरफ्तार कर लिया गया। लाला हरदयाल का अमरीका में रहना मुश्किल हो गया था इसलिए वह जर्मनी पहुंच गए। पंजाब और बंगाल में एक साथ विद्रोह करने की योजना बनाई गई थी। इस काम के लिए सत्यनेद्रनाथ सेन और पिंगले को भारत भेजा गया। जून १९१५ में बंगाल में अस्त्र-शस्त्र उतारने का प्रबंध किया गया। जर्मनी से दो जहाज बंदूकें भर कर भेजे गए। दोनों जहाजों को एक निर्दिष्ट स्थान पर मिलना था लेकिन वह दोनों न मिल सके और इसी बीच उन्हें एक अंग्रेजी जंगी जहाज मिल गया। दोनों जहाज पकड़े गए और भारत तक पहुंच ही न पाए। इसी बीच कुछ क्रांतिकारी फिलीपींस में पकड़े गए और उन्होंने भेद खोल दिया। इस तरह जब जर्मनी की सहायता बेकार हो गई तो जर्मनी ने सहायता देना भी बंद कर दिया।


लाला हरदयाल की मृत्यु


इसके बाद लालाली स्वीडन चले गए और १९२७ में ग्रेट ब्रिटेन पहुंचे। इंग्लैंड में लालाजी को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा। वह विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक संगठनों में भाषण देते और यही उनकी आय का साधन था। उन्होंने किसी प्रकार दस वर्ष लंदन में बिताए। अब उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। वह अधिक समय पढ़ने में लगाते। उन्होंने कोशिश की कि किसी प्रकार भारत आ जाएं। १९३८ में वह अमरीका पहुंचे। भारतीय लाला हरदयाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। यहां से लालाजी के आने के लिए किराए का प्रबंध भी लोगों ने कर दिया, लेकिन अचानक यह समाचार मिला कि ४ मार्च १९३९ को वह स्वर्ग सिधार गए।

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