काबा शरीफ का इतिहास । Kaaba Sharif History

काबा की मूर्तियां, काबा शरीफ का इतिहास, काबा का काला पत्थर, काबा के अंदर क्या है,


इस्लाम के चार धर्म-स्कन्धों में 'हज्ज' या 'काबा' यात्रा भी एक है । 'काबा' अरब का प्राचीन मंदिर है जो मक्का शहर में है ।

विक्रम की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में रोमक इतिहास लेखक दौद्रस् सक्लस्' लिखता है - "यहाँ इस देश में एक मन्दिर है, जो अरबों का अत्यन्त पुज्यनीय है ।“

महात्मा मुहम्मद के जन्म से लगभग ६०० वर्ष पूर्व ही इस मन्दिर की इतनी ख्याति थी कि 'सिरिया', 'अराक' आदि प्रदेशों से लाखो यात्री प्रतिवर्ष दर्शन के लिए वहाँ जाया करते थे । पुराणो में भी शिव के द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में मक्का के महादेव का नाम आता है । हज्रु ल-अस्वद् ( कृष्ण-पाषाण) इन सब विचारो का केन्द्र प्रतीत होता है यह काबा की दीवार में लगा हुआ है । आज भी उस पर चुम्बा देना प्रत्येक 'हाजी' ( मक्कायात्री ) का कर्त्तव्य है, । पर कुरान में इसका कोई विधान नहीं, किन्तु पुराण के समान माननीय 'हदीस' ग्रंथो मे उसे भूमि पर भगवान् का दाहिना हाथ कहा गया है । यही मक्केश्वरनाथ हैं जो काबा की सभी मूर्तियों के तोड़े जाने पर भी स्वयं ज्यो के त्यों विध्यमान है इतना ही नही बल्कि इनका जादू मुसल्मानों पर भी चले बिना नही रहा, और वह पत्थर को बोसा देना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते हों यद्यपि अन्य स्थानों पर मूर्ति पूजा के घोर विरोधी है ।

इस पवित्र मंदिर के विषय में कुरान में आया है –

“निस्सन्देह पहिला घर मक्का में स्थापित किया गया, जो कि धन्य है तथा ज्ञानियों के लिये उपदेश है ।" (५:१३ ४)

जिस प्रकार यहाँ काबा के लिये 'पहिला घर' और 'पवित्र गृह' कहा गया है, उसी प्रकार मक्का नगर के लिये भी उम्मुल्करा (ग्रामों की माँ) अथवा पहिला गांव शब्द आया है । उस समय मक्का के मंदिर में ३६० मूतियाँ थीं । आरम्भ में जब “किधर मुख करके नमाज पढ़ी जाय” यह प्रश्न महात्मा मुहम्मद के सम्मुख आया; तो महात्मा ने सारे अरब के श्रद्धास्पद किन्तु मुर्तिपूर्ण मक्का-मंदिर को अयोग्य समझ, अमृर्तिपूजक एकेश्वर-भक्त यहुदियों के मुख्य स्थान ‘योरुशिलम्' मंदिर की ओर ही मुख कर के नमाज पढ़ने की आज्ञा अपने अनुयायियों को दी । इस प्रकार मक्का-निवास के अन्त तक अर्थात् तेरह वर्ष इसी प्रकार नमाज पढ़ी जाती रही । मदीना में आने पर भी कितने ही दिनों तक 'योरुशिलम्' की ओर ही मुख करके नमाज पढ़ी जाती रही । अन्त में यहुदियों के अभिमान-हमारे ही काबा का आश्रय मुहम्मद के अनुयायी भी करते है ।

सांघिक-नमाज का इस्लाम में बड़ा मान है । वस्तुत: वह संघिशक्ति को बढ़ाने वाला भी है । सहस्रों एशिया, यूरोप और अफ्रीका-निवासी मुसल्मान जिस समय एक ही स्वर, एक ही भाषा और एक भाव से प्रेरित हो ईश्वर के चरण में अपनी भक्ति करने के लिये एकत्रित होते हैं, तो कैसा आनन्दमय उत्साह-पूर्ण दृश्य होता है । उस समय की समानता का क्या कहना ? एक ही पंक्ति में दरिद्र और बादशाह दोनों खड़े होकर बता देते हैं, कि ईश्वर के सामने सब बराबर हैं ।

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