लाहिड़ी महाशय चमत्कार | Lahadi Mahashay


लाहिड़ी महाशय की फोटो न खीची जा सकी


लाहिड़ी महाशय अपना चित्र खींचा जाना पसंद नहीं करते थे । एक बार उनके मना करने पर भी कुछ शिष्यों के साथ उनका चित्र खींचा गया, किन्तु आश्चर्य कि फोटोप्लेट पर आस-पास बैठे शिष्यों का स्पष्ट चित्र अंकित था और बीच में बैठे गुरुदेव लाहिड़ी महाशय का चित्र नहीं था ।

इस घटना पर भी सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया तथा गंगाधर बाबू ने गुरुदेव का चित्र लेने की प्रतिज्ञा की । दूसरे दिन प्रातः काल गुरुदेव के संध्योपासनाकाल में गंगाधर बाबू पूरी तैयारी के साथ आए । गुरुदेव लकड़ी की बेंच पर पद्मासन मुद्रा में विराजमान थे, उनके पीछे कपड़े का पर्दा पड़ा था । गंगाधर बाबू ने पूरी सावधानी के साथ बारह प्लेटों पर चित्र लिए, किन्तु हर प्लेट पर केवल बेंच और पर्दे के छाया चित्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं था । बाबू गंगाधर का अभिमान दूर हो गया और रुदन करते हुए उन्होंने गुरुदेव की बार-बार प्रार्थना की । लाहिड़ी महाशय ने प्रार्थना से द्रवित होकर कहा कि तुम्हारा कैमरा सर्वव्यापी अगोचर का चित्र लेने में असमर्थ है । मैं भी उसी का एक अंश हूं । फिर मेरा चित्र इस कैमरे द्वारा कैसे लिया जा सकता है ?

गंगाधर बाबू ने पुनः प्रणाम करते हुए गुरुदेव का चित्र लेने की उत्कल अभिलाषा व्यक्त की और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी । तब कहीं गुरुदेव ने चित्र लेने की अनुमति दी और दूसरे दिन प्रातः काल अपना चित्र खिंचवाया ।


श्वास के बिना जीवित रहने वाले योगी


लाहिड़ी महाशय का पड़ोसी युवक चन्द्रमोहन, डॉक्टरी की परीक्षा पास करके आया था । एक दिन वह योगीराज से आशीर्वाद ग्रहण करने आया । कुछ देर बैठने पर योगीराज ने शरीर विज्ञान से संबंधित वार्ता आरम्भ करके चन्द्रमोहन से चिकित्सा के विषय में कुछ प्रश्न पूछें । उनका अंतिम प्रश्न था - “आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मृतक की क्या परिभाषा है ? ” इसके बाद अपने शरीर का परीक्षण करने को कहां ।

चन्द्रमोहन ने जब लाहिड़ी महाशय के शरीर का परीक्षण किया, तो उसके होश उड़ गए । योगीराज के शरीर में जीवन के कोई भी लक्षण शेष नहीं थे । न श्वास की गति, न हृदय में धड़कन, न नाड़ी में कोई स्पन्दन, पूरे शरीर में कोई क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं, सारा शरीर निश्चल और निस्पन्द था । कुछ समय बाद उन्होंने आंखें खोलीं और डॉक्टर से कहा - 'चन्द्रमोहन! अतीन्द्रिय जगत् बहुत ही विलक्षण है। उसके अनेक तथ्य अभी तक अज्ञात हैं । तुम्हारा आधुनिक विज्ञान वहां तक अभी नहीं पहुंचा है।' हां, भारतीय योगियों की सदा से उसमें रुचि रही है ।

चन्द्रमोहन इस घटना से बहुत प्रभावित हुआ और लाहिड़ी महाशय का शिष्य हो गया । बाद में वह प्रतिष्ठित चिकित्सक बना ।


लाहिड़ी महाशय का सूक्ष्म शरीर से लंदन यात्रा


लाहिड़ी के आफिस के सुपरिटेंडेट एक अंग्रेज अफसर थे । उनकी पत्नी इग्लैंड में बहुत बीमार थी । कई दिनों से उनका कोई समाचार साहब को नहीं मिला था, इसलिए साहब कुछ परेशान रहते थे। लाहिड़ी महाशय ने जब उन्हें बहुत चिंतित देखा, तो एक दिन उनकी व्यथा का कारण पूछ ही लिया । व्यथा का कारण बीमार पत्नी का समाचार ज्ञात न होना है, यह जानकर लाहिड़ी ने साहब से कहा कि वह आज ही लंदन से उनकी पत्नी का समाचार ला देंगे ।

पहले तो साहब को लाहिड़ी महाशय की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ, किन्तु फिर भी उन्होंने उदास दृष्टि से लाहिड़ी को देखा, मानो वह अतिशीघ्र हों । पत्नी का समाचार जानने के इच्छुक लाहिड़ी महाशय साहब को आश्वासन देकर समीपस्थ कमरे में ध्यानमग्न हो गए । कुछ समय बाद उन्होंने साहब को बताया- 'आपकी पत्नी अब ठीक हो गई हैं । वह शीघ्र ही आपको पत्र लिखेंगी । इतना ही नहीं, उन्होंने साहब को पत्र की कुछ पंक्तियां भी बताई और कहा कि वह कुछ समय बाद आपसे मिलने भारत भी आएंगी।'

साहब ने लाहिड़ी महाशय की बात तो सुन ली, किन्तु उन्हें उन पर विश्वास नहीं हुआ । कुछ दिन बाद उन्हें अपनी पत्नी का पत्र प्राप्त हुआ, जिसकी वही भाषा थी, जो लाहिडी ने बताई थी । इस घटना से साहब आश्चर्यचकित हो गए और अत्यधिक प्रभावित हुए ।

'महीने बाद साहब की पत्नी भारत आई । जब उन्होंने लाहिड़ी महाशय को देखा, तो कुछ तुरन्त पहचान लिया तथा साहब को बताया- 'इग्लैंड में मैं इन्हीं महात्मा की कृपा से रोग मुक्त हुई थी । जब मेरे जीवन की कोई आशा नहीं रही थी, तो इन्हीं महात्मा ने मेरी रोग शैया के निकट आकर कृपा पूर्ण दृष्टि से देखा, जिससे मुझे पुनर्जीवन मिला ।'

पत्नी का कथन सुनकर साहब के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । वह लाहिड़ी महाशय से बहुत प्रभावित हुए ।

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