नमाज का सही तरीका | Namaz Ka Tarika In Hindi


नमाज (सलात्, प्रार्थना) प्रत्येक मुसल्मान का नित्य कर्म है, जिसका न करने वाला पाप-भागी होता है । कहा है - "सलात और मध्य-सलात के लिये सावधान रहो । नम्रतापूर्वक परमेश्वर के लिये खड़े हो । यदि खतरे में हो तो पैदल या सवार ही उसे पूरा कर लो । पुनः जब शान्त हो तो प्रभु को स्मरण करो।" (३:३२:३-४)


पांच नमाज का वक्त


नमाज का स्थान इस्लाम में वही है, जो हिन्दू धर्म में संध्या या ब्रम्हा-यज्ञ का । यद्यपि कुरान में पंचगाना या पाँच वक्त की नमाज़ का वर्णन कहीं नही आया है, किन्तु वह एक प्रकार से सर्वमान्य है । पंचगाना नमाज हैं -

(१) ' सलात अल फज्र' (प्रातः प्रार्थना) जो उष:काल ही से करनी पड़ती है ।

(२) ' सलात अल जोह' ( मध्याह्योत्तर तृतीय प्रहर के आरम्भिक प्रार्थना) यह दोपहर के बाद तीसरे पहर के आरम्भ में होती है ।

(३) ' सलात अल अस्त्र ' (मध्याह्नोत्तर चतुर्थ प्रार्थना) यह चौथे पहर के आरम्भ में होती है ।

(४) ‘मलातुल-मग्रिब' (सान्ध्य-प्रार्थेना ) यह सूर्यास्त के बाद तुरन्त होती है ।

(५) 'सलात अल ईशा' (रात्रि प्रथमयाम प्रार्थना) रात्रि में पहिले प्रहर के अन्त में होती है ।

इनके अतिरिक्त अधिक (निशीथ-प्रार्थना) और ' सलात उल जुहा ' (दिवा प्रथमयाम प्रार्थना) भी करते हैं, जो क्रमशः रात के चौथ पहर के आरम्भ तथा पहर भर दिन चढ़े की जाती हैं ।


नमाज पढ़ने के नियम । नमाज के नियम


नमाज के लिये खड़ा होने से पहिले निम्न क्रम से वजू (अंग-शुद्धि ) करनी चाहिये -

(१) दोनों कलाई धोना ।

(२ ) दातबन या केवल जल से मुख धोना ।

(३) पानी से नाक का भीतरी भाग धोना ।

(४) चेहरा धोना ।

(५) कोहनी तक हाथ धोना ।

(६) दोनों भीगे हाथ मिलाकर तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से सिर पोछना ।

(७) गुल्फ पर्यन्त पैर धोना, पहिले दाहिना फिर बायाँ । सोने और पेशाब पायखाने से बाद फिर से 'वजू' की आवश्यकता होती है अन्यथा एक बार का किया ही काफी है । ‘मैथून' के बाद केवल ‘वजू’ से काम नहीं चलता, उस समय पूर्ण स्नान करना चाहिये । जल न मिलने पर अथवा बीमार होने पर शुद्ध सूखी मिट्टी हाथ मे लगाकर सिर, मुख करपृष्ठ पर फिरा देना चाहिये । इसे अरबी में ‘तयम्मुम’ कहते हैं ।

शुद्धि के विषय में कुरान इस प्रकार कहता है - "हे विश्वासियो मुसल्मानो ! जब तक जो कुछ तुम कहते हो उसे नहीं समझते, या तुम नशा में हो, अथवा यात्रा में न होने पर भी अशुद्ध हो, तब तक नमाज में न जाऔ, जब तक कि तुम स्नान न कर लो । यदि रोगी या यात्री की अवस्था में मलोत्सर्ग या स्त्री-स्पर्श किया, और जल न मिला; तो शुद्ध मिट्टी ले उसे हाथ-मुँह पर फेरो ।" (४:७:१)


नमाज के प्रकार


नमाज के दो प्रकार हैं, जिन्हें फर्द (वैयक्तिक) और सुन्नत (सामूहिक) कहते हैं । 'इलाम' ( नमाज, पढ़ाने वाले अगुआ) के पीछे पढ़े जाने वाले भाग को 'सुन्नत' और अकेले पढ़े जाने वाले को 'फर्द' कहते हैं । समूह के साथ 'नमाज' पढ़ने में जो किसी कारण असमर्थ है, उसके लिये 'सुन्नत' भी 'फद' हो आता है । प्रत्येक नमाज कुछ 'रकात' पर निर्भर हैं । जितना जप करके एक बार भूमि में सिर रख नमन किया जाता है, उसे रकात कहते हैं ।

(१) सवेरे को नमाज में दो 'रक़ात' सामुहिक और दो व्यक्तिक हैं ।

(२) एक बजे की नमाज अपेक्षाकृत कुछ लम्बी होती है । इसमें पहिले चार या दो 'रक़ात' वैयक्तिक, मध्य में चार रकात सामूहिक और अन्त में दो रक़ात व्यक्तिक जपने पड़ते हैं । शुक्रवार के दिन की बड़ी साप्ताहिक नमाज इसी समय पड़ती है । किन्तु इसमें चार 'रक़ात' सामूहिक के स्थान पर दो ही पढता पडता है बाकी दो के स्थान पर 'इमाम' का 'खुत्बा' या उपदेश होता है, जिसे सब लोग सावधान हो सुनते हैं !

(३) चार बजे की नमाज में चार 'रक़ात' सामूहिक पढी जाती है ।

(४) सांध्य नमाज में तीन 'रक़ात' वैयक्तिक पढने अनन्तर दो 'रक़ात' सामूहिक पढ़ना पढ़ता है ।

(५) नौ बजे रात की नमाज में चार 'रक़ात' वैयक्तिक, पुन: दो 'रकात' सामूहिक, पीछ फिर 'चित्र' नामक तीन 'रकात वैयक्तिक पढ़ी जाती हैं ।

निशीथ-प्रार्थना में आठ 'रकात' वैयक्तिक होती हैं ।


ईद की नमाज


ईद की नमाज वर्ष में एक बार ही पढ़ी जाती है, में दो 'रकात' सामूहिक होती हैं, फिर उपदेश होता है ।

यात्रा काल में सवेरे की नमाज छोड़कर बाकी सभी नमाज में सामूहिक 'रकात' भी वैयक्तिक हो जाती हैं, तथा द्वितीय, तृतीय और पंचम की चार 'रक़ात' में वैयक्तिक दो ही रह जाता हैं । यदि यात्रा लगातार चार दिन से अधिक की हो, तो सभी नमाजो को पढ़ना कर्तव्य है । यदि दो या इससे अधिक नमाज पढ़ने वाले हो तो उन्हे अपने मे से एक को “इमाम” (नमाज पढ़ाने वाले अगुआ) बना लेना चाहिये ।

यहा नमाज मे पढे जाने वाले मूल अरबी वाक्य हिंदी अनुवाद के साथ दिए जा रहे है ।

नमाज के समय को सूचना देने के लिये एक आदमी जिसे ‘मुअज्जिन' कहते हैं-'क़ाबा' की ओर मुख करके ऊँचे स्वर से कहता है -

(१) 'अल्लाहु-अकबर’ (परमेश्वर अत्यन्त महान् है) [यह चार बार]

(२) ' अशहदु अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह' (साक्षी देता हूँ कि परमेश्वर के सिवाय कोई पूज्य नहीं) [दो बार ]

(३) ‘अशहदु अन्न मुहम्मद रसूलल्लाह’ (साक्षी देता हूँ कि मुहम्मद ईश्वर का दूत है) [दो बार ]

(४) ‘हय्य अलस्सलात्’ (आओ नमाज में) [ दाहिने ओर मुँह करके दो बार]

(५) हय्य अलल्-फलाह ।" (भलाई की ओर आओ) [बाई ओर मुँह करके दो बार]

(६) 'अल्लाहु-अकबर’ [दो बार]

(७) ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ (परमेश्वर के सिवाय दूसरा पूज्य या ईश्वर नहीं) (७) ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ (परमेश्वर के सिवाय दूसरा पूज्य या ईश्वर नहीं)

सवेरे की नमाज में (५) के बाद यह वाक्य कहा जाता है "अस्सलातो खैरून मन्नू" (नमाज निद्रा से श्रेष्ठ है) [ दो बार ]


इक़ामत क्या है


नमाज के लिये खड़े होने को 'इक़ामत' कहते हैं । 'इक़ामत' में (१) से (५) तक के वाक्यों को एक-एक बार पढ़ने के बाद इसे दो बार पढ़ते हैं -

"क़द् क़ामतिस्सलात" (नमाज आरम्भ हुई) ईद की नमाज़ में 'अजान' और इक़ामत के स्थान पर (१) ही को सात बार पहिली 'रक़ात' में पढ़ते हैं, तथा दूसरी 'रकात' माहात्म्योच्चारण' के बाद, इसे पाँच बार जपते हैं । शुक्र की नमाज में 'अजान' दो बार होती है । यह दूसरी अजान इमाम' के उपदेश के प्रारम्भ में उसकी सूचना के लिये दी जाती है ।

१-'काबा' मुख हो दोनो हाथो को कान तक उठाकर खड़े हुए 'अल्लाहु-अकबर' कहना ।

२-क्रियाम' (उत्थान) – बाये कर पृष्ठ पर दाहिनी हथेली को रख छाती या नाभी से लगाये हुये पढ़ना

"इन्नी बज्जह्तो लिल्लजी फतरस्समावाति वल अर्ज हनीफन व मा अना मिनल्मुश्रिकीन् । इन्नी सलातो व नुसुकी व मह्याय व ममाती लिल्लाहि रव्विल्-आलमीन् । ला-शरीक लहु व विजालिक उमिर्तु, व अना मिनल्-मुस्लिमीन् । अल्लाहुम्म ! अन्तल्मलिको ला इलाह इल्ला अन्त, अन्त रब्बी व आना अब्दुक जलम्नु नफसी वअतरफ्तु विजुन्बी, फ़-अराफिर् ली जुनूबी जमीअन, इन्नुहु लायगाकिरुज्जुनूब इल्ला अन्त व'हदिनी अहूसनल्-अखुलाकि ला यहदी लिअह्सनिहा इल्ला अन्त वस्त्रि अन्नी सय्विअहा ला यस्त्रिफु अन्नी सय्यिच्अहा इल्ला अन्त ।"

एकेश्वर विश्वासी मैंने उसकी ओर मुँह किया, जो भूमि और आकाश का कारण है । मैं अनेकों ईश्वर मानने वालों में से नही हूँ । निस्सन्देह, मेरी प्रार्थना, मेरी बलि, मेरा जीवन और मरण जगदीश्वर स्वामी के लिये है । उस (परमेश्वर) का कोई साक्षी नही उसी से आज्ञा हुई और मैं मुसल्मान हू । हे परमेश्वर ! तू मालिक है तेरे बिना दुसरा ईश्वर नही तू मेरा स्वामी है और मैं तेरा सेवक । मैंने अपने अपने उपर अन्याय किया, मैंने अपने अपराध को स्वीकार किया । तू मेरे अपराधों को क्षमा कर, निस्सन्देह तेरे सिवाय कोई अपराध क्षमा करने वाला नहीं । मुझे उत्तम आचार सिखा; क्योंकि, तेरे अतिरिक्त कोई उन उत्तम आचारो को नही सिखाता । मुझसे दुराचारो को परे हटा क्योकी तेरे अतिरिक्त कोई उन दोनों को हटा नहीं सकता।

३ - तब नमाज़ी, 'अल्लाहु अक्बर' कहते हुए अपने मस्तक को यहा तक झुकाते है की हाथ घुटने तक पहुच जाते है । इसी को “रकूअ” कहते है । अब कम से कम तीन पढ़ते हैं -

"सुब्हान रब्बिय-लू-अजीम् । (महाप्रभु का मंगल हो) ।

इसके बदले या इसके साथ में कोई-कोई इसे पढ़ते हैं - सब्हानक अल्लाहुम्म ! रब्बना व विहम्दिक अल्लाहुम्म ! अग़्फिगूर ली । (हे महाप्रभु ! तेरे लिये मंगल है, मेरे स्वामी ! तेरे लिये स्तुति है, हे परमेश्वर ! मुझे क्षमा कर) ।

४ - फिर निम्न वाक्यों को उच्चारण कर गर्दन सीधी करके खड़ा रहना होता है -

"समिअल्लाहु लिमन् हमिदः" ( जो उसकी स्तुति करता है प्रभु उसे सुनता है )

"रव्वना ! व लक-लू-हम्दु" (हे मेरे स्वामी ! स्तुति तेरे लिये है)

५ - पुनः निम्न वाक्य को कम से कम तीन बार बोलते हुए, सिज्दा(प्रणाम) करना, अर्थात् इस प्रकार प्रणाम करना कि पैर के पंजे, घुटने दोनों हाथ और ललाट भूमि को छुएं ।

"सुबहान रव्बियल् अअला (मेरे सबसे उचे स्वामी के लिये मंगल हो)

इसके साथ या बदले में निम्न वाक्य भी कहा जाता है - "सुब्हानकल्लाहुम्म ! रब्बना व विहम्दिकल्लाहुम्म :

६ - फिर 'जल्सा'- अर्थात् दोनों पैर पीछे मोड कर वैठ जाना ।

७ - तदनन्तर फिर 'सिज्दा (प्रणाम ) ऊपर लिखे क्रम से करते है ।

इक हमीदुन् मजीदन् । अल्लाहुम्म ! बारिक् अला-मुहम्मदिन्।

इतना हो जाने पर रकात नमन पुरी होती है ।

अंत में दाहिनी और बाईं ओर मँह फेर कर प्रतिबार निम्न वाक्य कहते हुए 'नमाज' समाप्त की जाती है –

अस्सलामु अलैकुम् व रहमतुल्लाहि ( तुम पर शान्ति और प्रभु की कृपा हो)

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