मिस्र की सभ्यता । मिस्र का इतिहास । इजिप्ट का इतिहास । Misra Ki Sabhyata | Misra Ka Pyramid


एथेंस के स्वर्ण युग से २००० वर्ष से भी अधिक समय पूर्व एक सभ्यता अस्तित्व में आयी, जो समुदायों के रूप में रहती थी और खेती करती थी । यह कानूनों पर आधारित एक पूर्णतः विकसित व्यवस्था थी । यह वही सभ्यता है जो अपने पीछे रहस्यमय पिरामिडों की एक श्रृंखला छोड़ गयी थी । यह सभ्यता थी - मिस्र की सभ्यता ।

मिस्र की सभ्यता लगभग ४००० वर्षों तक अस्तित्व में रही । इसका काल ३१०० ई.पू. से ५०० ई.पू. तक माना जाता है । इस सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसने अपने अभ्युदय से लेकर अंत तक अपने मूलभूत जीवन तथा शासन की व्यवस्था को अपरिवर्तित रखा । यद्यपि इस सभ्यता को, अपने समृद्ध स्वतंत्र साम्राज्य से विदेशी शासनों द्वारा पददलित होने तक, बार-बार उत्थान तथा पतन का सामना करना पड़ा । फिर भी मिस्र की सभ्यता के आधारभूत मूल्य कभी नहीं बदले ।

अभी तक इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि यह सभ्यता किसी अन्य सभ्यता की ऋणी रही हो अथवा कोई अन्य महत्त्वपूर्ण सभ्यता इसमें से उत्पन्न हुई हो । मिस्र की सभ्यता की खोज फ्रांसीसी विद्वानों ने १८वीं शताब्दी के अंत में की थी । मिस्र की सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कला, चित्रलिपि की (Hieroglyphic language) तथा मृत्यु के विषय में चिन्तन-मनन रहा है ।

मिस्र के धर्म के उद्गम स्रोत आज भी अज्ञात हैं । आरंभिक काल में वहां बहुदेववाद का बोलबाला था । इनमें से कुछ देवता मानव की आकृति के थे, तो कुछ पशु की आकृति के थे और कुछ मनुष्य तथा पशु का मिला-जुला रूप थे । अब तक मिस्र के धर्म विषयक रहस्यों को सुलझाने के सभी प्रयत्न असफल सिद्ध हुए हैं । प्रत्येक नगर का अपना एक अलग देवता तथा धार्मिक मान्यताएं होती थीं । इसके बावजूद वे लोग एक-दूसरे के धर्म के प्रति सहिष्णु थे ।


मिस्र का धर्म


मिस्र राज्य एक दैवी व्यवस्था (Divine Order) का अभिन्न अंग माना जाता था । मिस्र साम्राज्य के शिखर पर फेरो (Pharaoh) की उपाधि से विभूषित दैवी राजा था । उस समय के लोगों का विश्वास था कि वह मृत्यु के बाद देवताओं के उस समूह में सम्मिलित हो जाता था, जो मिस्र की रक्षा करता था । राजा को आकाश के देवता होरस (Horus) का प्रतिरूप माना जाता था । वह संपूर्ण साम्राज्य में कानून तथा आर्थिक व्यवस्था लागू करता था । यह कार्य वह अपने सामंतों तथा अधिकारियों के माध्यम से करता था, जिनका नेतृत्व उसका वज़ीर (Vizier) करता था । इसके अतिरिक्त इस कार्य में मदद करने के लिए पुजारियों का एक विशाल दल भी होता था, जिन्हें धर्मशास्त्री (Scribes) अथवा निरीक्षक भी कहा जाता था ।

ये धर्मशास्त्री बहुत बुद्धिमान होते थे । वे कृषि, उद्योग तथा व्यापार आदि सभी पर नियंत्रण रखते थे । उन्होंने नील नदी के चढ़ाव को मापने के लिए मापदंड (Nilometres) बनाए । वे ही होने वाली फसल का पूर्वानुमान लगाते और उसके आधार पर राजस्व निर्धारित करते थे ।

अन्य महत्त्वपूर्ण वर्गों में पुजारी तथा सैनिक आते थे । मिस्र में कच्चे माल का अभाव था, अतः यह प्रायः आयात किया जाता था । कभी-कभी खनिजों की अधिक मात्रा प्राप्त करने के लिए शक्ति का भी प्रयोग करना पड़ता था और इसके लिए सैनिकों की मदद ली जाती थी ।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य वर्ग भी थे, जिन्हें "मध्यम वर्ग" कहा जाता था । इस वर्ग में व्यापारी, शिल्पकार तथा कलाकार आते थे । इस वर्ग को पूरी तरह से राजा के इशारों पर नाचना पड़ता था । कलाकारों को चित्रों में वही दर्शाना होता जो राजा का आदेश होता था ।

इन वर्गों के अतिरिक्त एक वर्ग बुद्धिजीवियों (Intellectual) का भी था । यह वर्ग पढ़ना-लिखना जानता था । संभवतः यह वर्ग समाज के उच्च वर्गों से काफी निकट का संबंध रखता था । यह वर्ग प्रार्थना-गीतों तथा भजनों की रचना करता था । मिस्र के किसान बहुत सादा जीवन बिताते थे । उन्होंने कभी भी भोज्य पदार्थों की कमी अनुभव नहीं की । फिर भी उन्हें एक शिकायत अवश्य थी कि उन पर अत्यधिक कर लगाए जाते हैं । इसके अतिरिक्त उन्हें यह डर भी निरंतर बना रहता था कि उन्हें कभी भी फेरो के पास ले जाया जा सकता है ।

मिस्र की सभ्यता का इतिहास अद्यतन उत्थान तथा पतन के बीच झूलता रहा है । शताब्दियों तक संपूर्ण विश्व पर इस सभ्यता का वर्चस्व बना रहा और अंततः सिकंदर के हाथों इसका पराभव हुआ । इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी मिस्र के निवासी वास्तुकला संबंधी श्रेष्ठता की चरम सीमा पर पहुंच गये । उनके अमर स्मारक पिरामिड तथा स्फिक्स आज भी आधुनिक विश्व के लिए एक जटिल पहेली बने हुए हैं ।

इतना सब होते हुए भी यहां के नागरिकों का जीवन एथेंस के नागरिकों से अच्छा नहीं था । नागरिकों में से अधिकांश लोग वस्तुतः दास थे, या तो युद्धों के दुष्परिणाम के कारण या फिर लिए गये ऋणों को न चुका पाने के कारण । इन दासों को फेरो की सेवा करनी पड़ती थी । फिर भी ये लोग सुरक्षित थे क्योंकि कानून के समक्ष सबको समानता प्राप्त थी ।

कानून-व्यवस्था की सक्षमता का एक प्रमाण यह है कि आक्रमणों के बाद भी उनकी सरकार टिकी रही । किन्तु मिस्र की सभ्यता के अंतिम १५०० वर्ष उसके अतीत के गौरव की परछाई मात्र थे । १००० ई.पू. से ही इस पर बाहरी आक्रमण होने प्रारंभ हो गये थे । लीबियावासी उत्तर-पश्चिम से आये, इथोपियावासी दक्षिण से आये तथा असीरियावासी उत्तर-पूर्व से आये । ५२५ ई.पू. में फारस की सेना ने मिस्र पर अधिकार कर लिया । ३३२ ई.पू. में काफी उथल-पुथल के बाद दुनिया के राजा सिकंदर ने मिस्र पर अधिकार कर लिया और ३३० ई.पू. तक मिस्र एक रोमन उपनिवेश बना रहा । ६४० ई.पू. में जब मुसलमानों ने मिस्र पर कब्जा कर लिया तो मिस्र की प्राचीन सभ्यता की सभी पहचान पूरी तरह से मिट गयी । यहां तक कि मंदिरों की दीवारों पर लिखी चित्रलिपि शैली को भी पतनोन्मुख सभ्यता के अंधविश्वासी निवासियों के जादुई संकेतों से अधिक कुछ नहीं माना गया ।

इस प्रकार इस प्राचीनतम सभ्यता के उत्थान व पतन का क्रम चलता रहा । फिर भी उनके वास्तु-शिल्प को पूर्णतया नष्ट नहीं किया जा सका और वह आज भी एक आश्चर्य का विषय है । पुरातत्त्ववेत्ताओं ने मिस्र की सभ्यता के इतिहास में लंबे-लंबे अंतरालों का वर्णन किया है । संभवतः ये कला के उत्थान व पतन के कारण उत्पन्न हुए थे ।

मिस्र की गर्म तथा शुष्क जलवायु ने वहां की कलाकृतियों को सुरक्षित रखने में काफी मदद की है । उनमें से कुछ तो आज भी लगभग उतनी ही नयी हैं, जितनी उस समय थीं, जब कलाकार उन्हें बनाकर हटे थे । मिस्र के गुंबदों, मंदिरों तथा मूर्तियों में उत्कर्षता तथा टिकाऊपन-ये दो विशेषताएं सदैव पायी गयी हैं । इन दो विशेषताओं के कारण मिस्र की संस्कृति उसी लीक पर चलती रही, जिसकी स्थापना पिरामिड-निर्माताओं ने की थी । मिस्र की सभ्यता की यह असीम पुरातनता (Antiquity) तथा रहस्यात्मकता पड़ोसी देशों के लोगों को यहां आने के लिये प्रेरित करती रही है । निःसंदेह यूनान की कला को मिस्रवासियों ने काफी सीमा तक प्रभावित किया है लेकिन यूनानी विज्ञान तथा दर्शन के विकास में मिस्रवासियों का कोई भी योगदान नहीं रहा है ।


मिस्र का पिरामिड


पिरामिड मृत व्यक्ति की ममी को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बनाये जाते थे । कुछ सबसे अधिक आश्चर्यजनक पिरामिड हैं - रेगिस्तान की सीमा पर स्थित गीजां पिरामिड (Giza Ka Pyramid), २६२० ई.पू. में सक्कार में निर्मित राजा जोसर का सीढ़ीदार जोसेर का पिरामिड (saqqara pyramid), ४४७ फुट ऊंचा शेफरन का पिरामिड (Chephren) तथा खिऑप्स (Cheops) का महान् पिरामिड ।

सक्कार पिरामिड मिस्र की वास्तुकला में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ के समान है क्योंकि इसी के साथ मिस्र ने लकड़ी तथा ईंटों के युग से पत्थरों के युग मे प्रवेश किया । इन पिरामिडों की संरचना अत्यधिक आश्चर्यजनक है । खिऑप्स का पिरामिड २३ लाख खंडों से निर्मित है, जिनका कुल भार ६५ लाख टन है । इन खंडों का भार इन खंडों को काटने-छांटने से पहले और भी अधिक रहा होगा । मिस्र के सैनिक अभियान के दौरान नेपोलियन ने हिसाब लगाया था कि इन महान् पिरामिडों में लगे सामान से यदि एक दीवार बनायी जाये, तो वह १० फुट ऊंची तथा एक फुट चौड़ी होगी तथा वह पूरे फ्रांस को घेर लेगी । फिर भी मिस्रवासियों को इतनी खुदाई करने तथा भार उठाने में कोई कष्ट अनुभव नहीं हुआ । अपने "फेरो" खिऑप्स की शक्तिशाली समाधि के निर्माण में, पत्थर खोदने वाले, उन्हें काटने तथा तराशने में ३० से अधिक वर्ष लगे । सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि इनके निर्माताओं ने इतनी कुशलता से यह कार्य किया है कि एक "सूई या बाल" भी दो पत्थरों के बीच के जोड़ों में प्रवेश नहीं कर सकता ।


मिस्र के स्फिंक्स


पिरामिडों के समान ही " मिस्र के स्फिंक्स " भी रहस्यपूर्ण माने जाते हैं । सबसे सुंदर स्फिंक्स गीजा का है । शताब्दियों के भूमि-कटाव के बावजूद भी, गीजा का स्फिंक्स प्रतिदिन उसी प्रकार सूर्यास्त को निहारता है । इसे एक चूना पत्थर की छोटी पहाड़ी को उकेरकर बनाया गया है । यह एक शेर की आकृति है, जिसका चेहरा मनुष्य का है । इसकी ऊंचाई ६६ फुट है तथा यह २४० फुट क्षेत्र को घेरे हुए है । प्रतीत होता है जैसे लंबे समय से यह गीजे का स्फिंक्स मिस्र की अनेक शासक कब्रों की रक्षा कर रहा हो ।


मिस्र के कानून


मिस्रवासियों ने कानून तथा व्यवस्था के क्षेत्र में पर्याप्त उन्नति की । उन कानून प्रायः मानवता के गुणों पर आधारित थे । हत्या करने वाले को मृत्य- दंड दिया जाता था हालांकि नर बलि के लिये दंड का कोई विधान नहीं था । पवित्र धार्मिक वस्तुओं को चुराने वाले को भी मृत्यु दंड ही दिया जाता था, किन्तु साधारण चोरियों के लिये बहुत अधिक दंड नहीं दिया जाता था । व्यभिचार के लिये कठोर दंड दिया जाता था । उस समय वर्ण व्यवस्था का प्रचलन नहीं था, यद्यपि व्यवसाय प्रायः आनुवांशिक आधार पर ही अपनाए जाते थे । यदि किसी निम्न वर्ग का कोई व्यक्ति किसी उच्च पद पर पहुंचना चाहे, तो उसे ऐसा करने से रोका नहीं जाता था किन्तु बन्धुआ मजदूरी तथा भारी करों के कारण कृषक वर्ग की दशा सदैव दयनीय बनी रही ।

मिस्रवासी मनुष्यों मे सर्वाधिक धार्मिक थे किन्तु उनकी आध्यात्मिक संस्कृति बहुत अधिक उच्चस्तरीय नहीं थी । वे विश्वास करते थे कि आत्मा अमर होती है । अतः वे मृत शरीर को अत्यधिक सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखते थे । आदिकालीन मिस्रवासी मानते थे कि प्रत्येक मनुष्य का एक प्रतिरूप (Double) भी होता है, जो उसकी मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है । अतः वे लोग ऐसी कब्रें बनाते थे, जो "प्रतिरूप का गृह" कहलाती थी । मृत व्यक्ति की सेवा के लिये इन कब्रों में सभी आवश्यक सामान जैसे- फर्नीचर, भोजन, अस्त्र-शस्त्र, पुस्तकें, मूर्तियां तथा चित्र रखे जाते थे तथा मृतक व्यक्ति की पसंद का रत्न अथवा लकड़ी से बनी हुई एक मूर्ति भी उसमें रखी जाती थी ।

मिस्र वासियों की दूसरी विचारधारा में बाद में कुछ परिवर्तन आया । वे मानने लगे थे कि मृत्यु के बाद आत्मा शरीर छोड़ देती है और फिर उसे ईश्वर के सम्मुख जाना पड़ता है । जांचने पर जो आत्मा बुरी पायी जाती है, उसे कष्ट दिए जाते हैं तथा अंत में उसका पूर्णतः नाश हो जाता है । अच्छी आत्माओं को ईश्वरीय संगति प्रदान की जाती है । व्यवहार में यह माना जाता था कि किसी आत्मा का उद्धार (Salvation) मृत शरीर के ममीकरण (Mummification), मंत्रों तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों पर निर्भर करता है ।

मिस्र की संपूर्ण सभ्यता का अध्ययन करने से यह प्रतीत होता है कि भौतिक प्रगति की तुलना में बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा नैतिक विकास की उपेक्षा की गयी थी । समय के साथ-साथ राजाओं, मंत्रियों तथा धनी लोगों के ऐश्वर्य तथा सुविधाओं में वृद्धि होती गयी । निर्धन लोगों की उपेक्षा की जाने लगी । फेरो की सेवा में लगे एक धर्मशास्त्री ने अपने एक मित्र को लिखा, "क्या कभी तुमने उस किसान की कल्पना की है, जो भूमि जोतता है । कर वसूलने वाला अधिकारी एक चबूतरे पर खड़ा, उपज का दसवां हिस्सा वसूलने में व्यस्त होता है । उसके आदमियों के पास (हब्शी) दास होते हैं, जिनके हाथों में ताड़ से बने कोड़े होते हैं । सभी यही चिल्ला रहे होते हैं "आओ, हमें अनाज दो।" यदि किसी किसान के पास अनाज नहीं होता, तो उसे पूरी ताकत से भूमि पर फेंक दिया जाता है, उसे नदी तक घसीटा जाता है तथा उसके सिर पर आघात किया जाता है।” यद्यपि उस समय कुछ जागरूक तथा धर्मात्मा पुजारी भी थे । वे सही दर्शन की खोज में लगे रहे तथा उन्होंने अपने धर्म की उचित व्याख्या की लेकिन ऐसे धर्मात्माओं को उंगलियों पर गिना जा सकता है । किन्तु उंगलियों पर गिने जा सकने वाले लोगों के सहारे कोई सभ्यता कब तक पनप सकती है । मिस्री सभ्यता के साथ भी यही हुआ । धीरे-धीरे आदर्शों से एकदम विमुख हो जाने के कारण यह सभ्यता समाप्त हो गयी।

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